Friday, November 1, 2019

एक बगल में चाँद होगा , एक बगल में रोटियां

एक बगल में चाँद होगा , एक बगल में रोटियां


एक बगल में चाँद होगा , एक बगल में रोटियां
एक बगल में नींद होगी , एक बगल में लोरियां
हम चाँद पे , रोटी की चादर , डाल कर सो जायेंगे
और नींद से कह देंगे लोरी कल सुनाने आयेंगे
एक बगल में खनखनाती सीपियाँ हो जायंगी
एक बगल में कुछ रुलाती सिसिकियाँ हो जाएँगी
हम सीपियों में भर के सारे तारे छु के आयेंगे
और सिसकियों को गुदगुदी कर कर के यूँ बहलाएँगे
अम्मा तेरी सिसकियों पे कोई रोने आएगा
कोई रोने आएगा
ग़म ना कर जो आयेगा वोह फिर कभी ना जायेगा
वोह फिर कभी ना जायेगा
याद रख पर कोई अनहोनी नहीं तू लाएगी
लाएगी तो फिर कहानी और कुछ हो जाएगी
होनी और अनहोनी की परवाह किसी है मेरी जान
हद से ज्यादा ये ही होगा हम यहीं मर जायेंगे
हम मौत को सपना बता कर , उठ खड़े होंगे यहीं
और होनी को ठेंगा दिखा कर खिल खिलाते जायेंगे

Friday, July 27, 2018

धर्म के राक्षसों की लपलपाती जीभ का कल्याण हो या नाश?

''अतापि और वतापि दो दैत्य थे. अतापि किसी भी राहगीर को बड़े प्रेम से अपने घर बुलाता, 'आप आइए मेरे घर. शायद आपको भूख लगी है. मैं स्वादिष्ट भोजन ग्रहण कराऊंगा.'
राहगीर ख़ुशी-ख़ुशी आ जाते और इतने में इधर वतापि अपनी मायावी, राक्षसी शक्तियों का प्रयोग करके बकरे का रूप धारण कर लेता. अतिथि उस स्वादिष्ट बकरे का भोजन करके प्रसन्नचित हो जाते. और इतने में अतापि आवाज़ लगाता- वतापि, वतापि बाहर आओ.
और अचानक अतिथि का पेट फटता और एक मांस का लोथड़ा बाहर आ जाता और राहगीर परलोक. फिर दोनों भाई खुशी के मारे नाच उठते, झूम उठते. धर्मों का रूप यही है. राहगीर को प्रेम से घर बुलाओ. आदर समेत भोजन ग्रहण कराओ. फिर उसकी आत्मा पर कब्ज़ा कर लो.
यहूदी, मुसलमान. ईसाई मुसलमान.हिंदू मुसलमान. सब अतापि वतापि हैं.''

~'सेक्रेड गेम्स' 

Tuesday, February 14, 2017

पहुँच किनारे भूल गए सब कैसी कश्ती मांझी कौन

पहुँच किनारे भूल गए सब कैसी कश्ती मांझी कौन



तुमने  चुप्पी साध  ली  है तो मैं  भी अब हो चला  हूँ मौन

वक्त फैसला देगा इस खामोशी का अपराधी कौन


अंधेरो में तो कोई ना कोई दीया  जलाना ही पड़ता है

रात कटी  भोर हुई ,तो दीये  की परवाह करता कौन


जब तक है मझधार में कश्ती मांझी की जरूरत रहती है

पहुँच किनारे भूल गए सब कैसी कश्ती मांझी कौन


दुनिया का दस्तूर है  शायद हम को ही मालूम नही

फायदा नही तो कैसा  रिश्ता  तू  कौन और मैं हूँ कौन


माप दंड उपयोगिता  है  रिश्ता  किस से कितना रखना है

बूढ़े बैल को जोत के अपने खेत में हल चलवाता कौन 


Thursday, August 25, 2016

सोचो कितना बवाल होता


समंदर सारे शराब होते तो सोचो कितना बवाल होता,
हक़ीक़त सारे ख़्वाब होते तो सोचो कितना बवाल होता..!!

किसी के दिल में क्या छुपा है ये बस ख़ुदा ही जानता है,
दिल अगर बेनक़ाब होते तो सोचो कितना बवाल होता..!!

थी ख़ामोशी हमारी फितरत में तभी तो बरसो निभ गयी लोगो से,
अगर मुँह में हमारे जवाब होते तो सोचो कितना बवाल होता..!!

हम तो अच्छे थे पर लोगो की नज़र में सदा बुरे ही रहे,
कहीं हम सच में ख़राब होते तो सोचो कितना बवाल होता..


लड़की लड़के से मत सता लड़की को पाप होगा , तू भी किसी दिन किसी लड़की का बाप होगा।
लड़का लड़की से : भगवान करे तेरा कहा सच्चा हो , जो मुझे बाप कहे वो आपका ही बच्चा हो।


पति (पत्नी से)- मेरा फोन आये तो कहना मैं घर पर नहीं हूं।
अचानक फोन की घंटी बजी..
पत्नी ने फोन उठाकर कहा- वो अभी घर पर हैं।
पत्नी के फोन रखते ही पति खीजते हुए बोला- तुम्हें मैंने मना किया था फिर भी क्यों बताया कि मैं घर पर हूं?
पत्नी- आपने अपने फोन के लिए मना किया था, वह फोन तो मेरे लिए आया था


न हम जाने इश्क मोहब्बत, न हम जाने प्यार,

पेट में जब तक पड़ें न रोटी, सब कुछ है बेकार !


मुद्दतों के इन्तज़ार के बाद बडी हिम्मत से मैने उसे बताया, मुझे 'आप ' पसंद हैं । वो बडी नासमझ निकली, और बोली, मुझे ' भाजपा ' ।

Tuesday, August 4, 2015

जो लोग अच्छे होते हैं दिखते नहीं हैं



जो लोग अच्छे होते हैं दिखते नहीं हैं


जो
 लोग अच्छे होते हैं दिखते नहीं हैं
चाहने वाले बाज़ार में बिकते नहीं हैं

ख़ुद से पराया ग़ैरों से अपना रहे जो
ऐसे लोग एक दिल में टिकते नहीं हैं

सूरत से जो सीरत को छिपाये फिरते हैं
वो कभी सादा चेहरों में दिखते नहीं हैं

होता है नुमाया दिल को दिल से, दोस्त!
मन के भेद परदों में छिपते नहीं हैं

इन्साँ है वह जो जाने इन्सानियत
हैवान कभी निक़ाबों में छिपते नहीं हैं

वक़्त में दब जाती हैं कही-सुनी बातें
हम कभी कुछ दिल में रखते नहीं हैं

पलटते हैं जो कभी माज़ी के पन्नों को
ये आँसू तेरी याद में रुकते नहीं हैं

नहीं मरना आसाँ तो जीना भी आसाँ नहीं
चाहकर मिटने वाले मिटते नहीं हैं



शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’