Wednesday, April 7, 2010

Interesting Facts about Women.

Interesting Facts about Women.




  • Women do NOT want an honest answer to the question, “How Do I look?”
  • Women do NOT want an honest answer to the question “Is that girl good looking?”
  • Women thinks there are never wrong. Apologizing is the man’s responsibility.
  • When a woman answer, “I am fine.”, After a few seconds, she is not fine.
  • One average, a woman kisses about 74 men before getting married!
  • A girl who stays at home knows much more than a gay who is 20, having out most of the day!!! (the power of GOSSIP.)
  • Most of the girls open their mouth while applying mascara.
  • All girls are not 100% committed in love.
  • Now days girls are not sincere to love compare to guys.


Friday, April 2, 2010

बहाना ढूंढ़ लिया...


कुछ रोज गुजारने की खातिर,एक आशियाना ढूंढ़ लिया
ता-उम्र होश में न आ सकू, ऐसा एक मयखाना ढूंढ़ लिया

क्या मालूम था मुझे, के होगी झूठी वो महफिले अपनी
अब आयी अक्ल, के जीने की खातिर वीराना ढूंढ़ लिया

पूछेगा गर खुदा मुझको,लाये क्या हो उस जहा से तुम
कर दूंगा नजर ये दिल टुटा, ऐसा एक नजराना ढूंढ़ लिया

मिलती नही जो इस दुनिया में,एक पहचान अब मुझको
अक्स जो देखा शीशे में अपना, के कोई बेगाना ढूंढ़ लिया

अपनी सूरत-ऐ-हाल पे हसता है ये सारा जमाना
हम भी समझेंगे के लोगो ने, हसने का बहाना ढूंढ़ लिया



Thursday, December 10, 2009

नौ दिन का उपवास और हमारा मन

नवरात्री के नौ दिन के उपवास का क्या औचित्य है. जब अधिकांश लोग(भक्त) नौ दि्न के उपवास के बाद फिर से भाव शून्य होकर अपने कार्य में लग जाते है. लोगो की धारणा रहती है. कि अगर हर साल की तरह इस साल भी उपवास नही रखा तो शायद कुछ अनिष्ट हो जायेगा. और लोग तो केवल टाईमपास करने के लिये रहते है तो कुछ भक्त दुसरो की देखा देखी , बराबरी करने के लिये रहते है. मेरे मोहल्ले में इस वर्ष भी महिलाओ के बीच नवरात्री का उपवास रहने के लिये कुछ इसी तरह का माहौल मैने देखा. लोगो में मा दुर्गा के प्रति भक्त कम और शो-बाजी ज्यादा दिखाई पड़ा, कौन रामनवमी के दिन सबसे पहले नौ कन्याओ को भोजन कराकर पुण्य कमाएगा, कौन सबसे बड़ा भक्त बनेगा. और अपने ग्रुप में रौब जमायेगा. यहा बता दू की मै बहुत बड़ा भगवान भक्त नही हू. लेकिन इस तरह की दिखावे ने मुझे व्यथित किया. नवरात्र के दिन मै जब अपने घर समोसे,कचौरियाव जलेबी ले जा रहा था. तभी मौहल्ले की एक महिला ने मुझसे पूछा की मै क्या ले जा रहा हू ? उसने जब समोसा,जलेबी और कचौरिया देखी तो मन मसोस कर और अफसोस भरे लहसे से कहा कि छी मै उपवास हू इसलिये नही खा सकती, यह सूनकर मैने सोचा की कुछ लोगो की भक्ति साधारण भौतिक वस्तुओ से विचलित हो जाती है. हमारे मौहल्ले की अधिकतर सास अपने बहुओ की चुगली , और अधिकांश बहुये अपने सास की बदनामी मे जुटी रहती है. तो इनके नौ दिन उपवास रहकर नौ कन्याओ को भोजन कराना कौन सा पुण्य देगा.
(मेरा औचित्य किसी को ठेस पहुचाने का नही हौ. मैने जो महसूस किया उसे ही कहा है.)

Tuesday, December 1, 2009

A simple, yet very expressive!


MOTHER IS GOD'S Best GIFT
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कुछ समय पहले माँ की मर्ज़ी के
बिना इस घर का पत्ता भी नहीं हिलता था, अक्सर
उनकी एक हाँ से कितनी बार हमारे जीवन में खुशियों का अम्बार लगा मगर धीरे
धीरे उनकी शक्तिया और उन शक्तियों का महत्व कम होते होते आज नगण्य हो गया !


अब अम्मा से उनकी जरूरतों के बारे में कोई नहीं पूछता, सब अपने अपने में
व्यस्त है, खुशियों के मौकों और पार्टी आयोजनों से भी अम्मा को खांसी खखार
के कारण दूर ही रखा जाता है !


बाहर डिनर पर न ले जाने का कारण भी हम सबको पता हैं..... कुछ खा तो पायेगी
नहीं अतः होटल में एक और प्लेट का भारी भरकम बिल क्यों दिया जाये, और फिर
घर पर भी तो कोई चाहिए ...


और परिवार के मॉल जाते समय, धीमे धीमे दरवाजा बंद करने आती माँ की आँखों में छलछलाये आंसू कोई नहीं देख पाता !


Thursday, August 13, 2009

आज आपने अपने बच्चे को गले लगाया?


गर्मियों का एक सुहावना सा दिन था। हल्के से बादल घुमड़ आए थे। नीलिमा जल्दी ही घर से निकल आयी, शाम की वॉक का मज़ा उठाने के लिये। उनकी कॉलोनी के पार्क में लाफ्टर क्लब के लोग जमा थे। ठहाकों का सैशन चल रहा था। उसके बाद एक महिला टच थैरेपी पर कुछ बोलने लगी। नीलिमा का ध्यान तेज़ तेज़ वॉक करते हुए एक आखिरी बात पर अटक गया कि हम बच्चों से सम्मान की अपेक्षा रखते हैं, प्रेम सिखाने की बात करते हैं, उनकी गलतियां निकालते हैं, कोई मुझे यह बताएगा कि आज सुबह से आपने कितनी बार अपने बच्चे को गले से लगाया?

नीलिमा के मन में यह बात गूंजती रही और वह सुबह से अब तक के दिन के हिसाब में लग गई, उसे याद आया सुबह सुबह उसका किचन में पराग के कान उमेठना, `` तुम रात को भी दांत साफ किये बिना सो गये थे अब सुबह भी... !'' उसने सोचा कि `` मैं भूल गई थी उसे सुबह का आलिंगन देना, जबकि मुझे पता था पिछले होमवर्क के बोझ से वह इतना थक गया था कि मैं ने ही कहा था `` चलो सो जाओ।'' हालांकि वह पिछला होमवर्क उसके बच्चों को लेकर मायके चली गई थी और उनका स्कूल मिस हुआ था।
नीलिमा को अपनी ही तीखी आवाज़ें चुभने लगीं, `` सलोनी, अब तुम दसवीं में आ गयी हो, अपना लंचबॉक्स तुम खुद पैक कर सकती हो न। हम दसवीं में पूरे घर का खाना बनाते थे। आलसी होती जा रही हो।'' या फिर नीलिमा की शिकायत रहती है कि सलोनी कभी उसे बता कर नहीं जाती... कि कहां जा रही है। हमेशा जवाब मिलता है ``मोबाइल है ना चैक कर लेना कहा हूँ।''

यहां भी नीलिमा भूल रही थी कि सलोनी ने बाहर के बहत से काम बखूबी संभाल रखे हैं - फोन बिल्स जमा करना, बैंक का काम, सब्ज़ी भी ले आती है... उस पर चार मुख्य विषयों की ट्यूशन अलग करती है। उसकी बेटी आलसी तो ज़रा भी नहीं है। और गैरज़िम्मेदार या विवेकहीन भी नहीं।
उसने पिछले कई दिनों की जांच की। अरसा हो गया था वह न बच्चों के साथ खेली थी, न उनके साथ रूटीन बातों के अलावा उनकी निजी समस्याआें को लेकर खुलकर बात की

बच्चे जब से थोड़े बड़े हुए हैं, और उसने अपना बुटीक खोला है, बच्चों को कभी गले से लगाया ही नहीं। जबकि इस प्रेम की छोटी सी हरकत में मुश्किल से २० सैकण्ड लगते हैं।

यह समस्या केवल नीलिमा की नहीं हम सभी की है। हम अपनी व्यस्तताआें के घेरे को सचमुच के घेरे से कुछ ज़्यादा बड़ा खींच कर देखते हैं और प्रेम जताने के छोटे छोटे तरीकों को भूलते जा रहे हैं। नीलिमा खुद को याद है... उसे उसके पिता ने हमेशा गले लगाकर जगाया, मां ने स्कूल जाते समय हमेशा चूमा। आज भी पिता मिलते हैं तो गले लगाते हैं उसे ही नहीं, उसके पति को, बच्चों को भी। यह कभी हमारे जीने के तौर तरीकों में शामिल था। आगमन पर गले लगाना, विदा पर भी।

हम अपने बच्चों की गलतियां तो बहत जल्दी निकालने लगे हैं, उनकी तारीफ कम करने लगे हैं। हमने अपनी अपेक्षाएं पढ़ाई, कंप्यूटर, डांस, पब्लिक स्पीकींग सबमें इतनी बढ़ा ली हैं कि हमें कम में संतोष नहीं होता। उस पर हम सहज स्नेह की छोटी छोटी अभिव्यक्तियों से बचने लगे हैं। क्योंकि व्यस्त रहते हैं। एक आलिंगन के लिये व्यस्त? आलिंगन का अर्थ केवल गले लगाना ही नहीं है। बच्चों के लिये उनकी मनपसंद डिश बनाना भी एक तरह से प्रेम की अभिव्यक्ति है। बच्चों के साथ खेलना, उनकी छोटी समस्या का हल निकालना भी एक प्रेम प्रदर्शन है। उनके बालों पर हाथ फिरा देना, हाथ थाम लेना, हाथ दबा देना, माथा चूम लेना जैसे छोटे प्रेम प्रदर्शन भी एक आलिंगन का काम करते हैं।

आईए आज से इसे एक माता या पिता के तौर पर आदत बना लें। कई लोग तो यह नहीं जानते कि अपना प्रेम बच्चों के प्रति कैसे अभिव्यक्त करें। अगर आप अपने बच्चों से प्रेम करते हैं तो इतना तो करें कि प्रेम की समस्त ऊर्जा बच्चे तक पहुंचे। एक आलिंगन... पेम से भरा। क्यों छोटे बच्चों को रोने से चुप कराने के लिये सीने से लगाया जाता है? बच्चे उस प्रेम को समझ कर शान्त होकर सो जाते हैं। बच्चे अगर बड़े हो गये तो क्या उनकी यह ज़रूरत समाप्त हो गई... नहीं वे आज भी ऐसा चाहेंगे...केवल अच्छे पलों में नहीं... केवल फर्स्ट आने पर नहीं ...अपने कठिन पलों में भी ... बिगड़े हुए मूड में, स्कूल से डांट खाकर आने पर, गणित में कम नम्बर लाने पर।

कई भारतीय परिवारों में प्रेम के प्रदर्शन को गैरपारंपरिक व व्यर्थ माना जाता है। खासतौर से पिता ऐसे प्रेम के दिखावों से बचते हैं और बड़े होते बेटे को `गले लगाना' करना बंद कर देते हैं। उन्हें लगता है कि इससे बच्चा बिगड़ जायेगा या कि अब कोई उम्र है? अगर स्पर्शों की भाषा को हम बड़े नहीं भूले और प्रेम के दौरान इस भाषा का इस्तेमाल करते हैं तो बच्चों के साथ हमने यह भाषा सीमित क्यों कर दी है?

अपने व्यक्तित्व के विकास की ओर अग्रसर बच्चों को इस भाषा की ज़रूरत है... आपका बच्चा स्टेज पर परफॉर्म करने जा रहा है। उसे आपके प्रेम की ज़रूरत है। परीक्षा देने जा रहा है, उसे गले से लगा कर गुडलक कहें। नयी खूबसूरत ड्रेस पहनी है आपकी बिटिया ने उसका माथा चूम लें। शब्दों की आवश्यकता ही नहीं।

अकसर देखा गया है कि घर में प्रेम पाने वाले बच्चे जब घर से बाहर निकलते हैं पे्रम से छलछलाते हुए, इस आत्मविश्वास से भरे हुए कि वे दुनिया के सबसे अच्छे बच्चे हैं तो वे बाहर की झूठी प्रशंसा व प्रेम के मोहताज नहीं रहते और उनका विवेक उनकी उंगली थामे रहता है।

नीलिमा की दुनिया लाफ्टर क्लब की उस टच थैरेपी वाली महिला ने बदल दी। सलोनी हमेशा अब कहीं जाने से पहले मम्मी से गले लग कर जाती है और बातों बातों में बता देती है - आज आठ से बारह क्लास है, फिर मां बीच में आपकी साड़ी बुटीक से कलेक्ट कर लाऊंगी। उसके बाद दो ट्यूशन, फिर एक फ्रेण्ड की बर्थडे ट्रीट है, मॉम आते हुए सात बजेंगे। मोबाइल पर बात करती रहना।
पराग आजकल स्कूल से आते ही उससे लिपटता है, स्कूल की तमाम बातें बताता है। ये नहीं कि बैग फेंका और सीधे कंप्यूटर पर लगे गेम खेलने।
नीलिमा के पति सोम ने भी अपनी व्यस्तता में से वक्त निकाल कर बच्चों को दो पल प्रेम प्रदर्शन के देना सीख लिया है। वे घनी व्यस्तता में से समय निकाल कर सलोनी का मोबाइल मिलाते हैं, पूछते हैं -`` हां तो मेरा बेटा, आज कहां व्यस्त है? शाम को जल्दी आ सको तो हम साथ एक अच्छी फिल्म देखें।''
`` यस डैडी, मैं जल्दी पहुंचती हूँ।''
या सोम पराग केा स्पोर्ट्स मैगज़ीन में से क्रिकेटर्स के पिक्चर्स काट कर उसकी स्पोर्टस फाईल के लिये देते हैं।

बच्चों में बदलाव स्वाभाविक ही है। वे प्रेम पाएंगे वहीं खिंचे चले आएंगे और बंधे रहेंगे।


के . सुधा